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राज्यवार एनजीओ

एनजीओ क्या है

NGO क्या है?
स्वयं सेवी संस्थान (NGO) की परिभाषा- गैर सरकारी संगठन
गैर सरकारी संगठन (NGO) या अलाभकारी संगठन (NPO) व्यक्तियों, कार्यकर्ताओं, स्वयं सेवकों (वोलंटीयर्स) और सामाजिक कल्याण में जुटे लोगों का एक समूह अथवा संगठन होता है.
NGO या NPO एक ऐसा सामाजिक स्वैच्छिक संगठन होता है जिसके बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ता, व्यक्तियों का समूह, समुदाय, नागरिक, वोलंटीयर्स आदि जन सेवक समाज के कल्याण और विकास के लिए कार्य करते हैं.
यदि व्यक्तियों का समूह या कोई समुदाय सामाजिक परिवर्तन पर या किसी ऐसे ही मुद्दे पर कार्य करना चाहता है या करता है तो वह भी बिना रजिस्टर्ड की हुई स्वयंसेवी संस्था (NGO) में आता है. एनजीओ रजिस्टर्ड भी हो सकती है और बिना पंजीकरण करवाए भी कोई समूह या संस्था समाज सेवा का कार्य कर सकती है. सरकार अथवा अनुदानदाता संगठनों से आर्थिक सहायता या अनुदान लेने के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया जरूरी है. अगर कोई समूह अनुदान नहीं लेना चाहे तो पंजीकरण जरुरी नहीं है.
एक रजिस्टर्ड संस्था (NGO) की अपनी अलग ही पहचान होती है. एक बार अधिकृत सरकारी रजिस्ट्रार आफिस से स्वयंसेवी संस्था का रजिस्ट्रेशन हो जाने से संस्था को सभी तरह की सहायता व वित्तीय अनुदान मिल सकता है. अपने सामाजिक व मानवीय नैतिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए संस्था को सुचारु रूप से चलाने का कार्य इससे जुड़े कोई भी सदस्य कर सकते हैं. स्वयंसेवी संस्था व्यावसायिक उद्देश्यों से परे मानवीयता और सहकार की भावना पर चलने वाला एक समुदाय-समूह-संस्थान होता है जो स्वतंत्र कार्य करता है सीधा सरकारी नियंत्रण में नहीं होता है. सरकार का नियंत्रण संस्थान पर कानूनी प्रक्रिया के दायरे से होता है और संस्थान अगर अनुदान ले रही है कोई और विनिमय का कार्य कर रही है तो आयकर और अन्य विभागों का नियंत्रण संस्थान की गतिविधियों पर होता है. अगर स्वयं सेवी संस्थान सरकार से अनुदान लेती है तो उस अनुदान के आय-व्यय का लेखा जोखा और उसका कहाँ उपयोग किया जाता है इस पर सरकार का नियंत्रण रहता है. विदेशी अनुदान से ली जाने वाली आर्थिक सहायता या राशि प्राप्त करने और उसे खर्च करने की प्रक्रिया पर भी सरकार का नियंत्रण रहता है. विदेशी अनुदान प्राप्त करने के लिए अस्थायी या स्थायी प्रमाण पत्र (FCRA) भी गृह मंत्रालय से लेना पड़ता है. विदेशी अनुदान के आय-व्यय का ब्यौरा भी गृह मंत्रालय को निर्धारित प्रारूप और प्रक्रिया में प्रस्तुत करना होता है. सभी स्वयंसेवी संस्था संगठित स्वदेशी समूहों द्वारा स्थानीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विकास कार्यों में सहयोग देने वाली प्राइवेट एजेंसी होती है. अपने नागरिकों के समूहों में स्वयंसेवी संस्था (NGO) समूहों, समुदायों, विभिन्न तरह के एसोसिएशन, क्लब जैसे लायन्स क्लब, रोटरी क्लब आदि के बैनर तले जागरुकता फैलाने और सरकारी नीतियां बनाने में महत्ती भूमिका निभाता है.
स्वयंसेवी संस्थाएं (NGOs) सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक स्तर पर पिछड़े वर्ग की उन्नति, बेहतरी व विकास के लिए कार्य करती है जिससे उनको समाज की मुख्यधारा में लाया जा सके. जिससे समाज में लोगों का जीवन स्तर उच्च हो और वे अच्छे से जीवन बसर कर सके.
एक सामुदायिक समूह और संगठन की तरह स्वयंसेवी संस्था (NGO) समाज में, समुदाय में, अपने क्षेत्र में परिस्थितियों और वातावरण में सकारात्मक परिवर्तन लाने के अपने लक्ष्य और उद्देश्य को पूरा करने के लिए कुछ कार्य करती है.
स्वयंसेवी संस्थाएं (NGOs) समाज में लोगों को उनके कानून और अधिकार के हक की लड़ाई में सहयोग देती है. स्वयंसेवी संस्थाएं सरकारी संगठन, मंत्रालय, विभाग, एजेंसीज और अधिकृत कार्यालयों को सरकारी उद्देश्य, नीति-नियम, कार्यक्रम, योजना आदि पूरा करने में सहयोग करता है. जनहित में स्वयंसेवी संस्थाएं ये सारे कार्य सरकार के साथ जनभागिता नीति के तहत करती है. स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ यह सहभागिता संवैधानिक व प्रजातांत्रिक तरह से होती है. स्वयंसेवी संस्थाएं लोगो की सहभागिता के लिए जानी जाती है. विभिन्न जरुरी सामाजिक मुद्दों पर जनसहभागिता जरुरी है. सूचना का अधिकार से जुड़ा अरुणा राय व लोकपाल विधेयक से जुड़ा अन्ना हजारे का नाम का जिक्र इस बात को समझाने के लिए पर्याप्त है कि जन सहभागिता किस तरह से जन आंदोलन बनती है और उनके परिवर्तन व्यवस्था में होता है.
सरकारी-गैर सरकारी, व्यावसायिक समूह, अन्य दानदाताओं के सहयोग से स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्य चलते हैं. स्वयंसेवी संस्थाओं को आर्थिक सहयोग सदस्यों की सदस्यता फीस से, प्राइवेट डोनेशन से व संस्था के उत्पाद बिक्री से मिलता है. स्वयंसेवी संस्था परोपकारी संस्था की हैसियत से सेवा कार्य करती है तो समाज के धनीवर्ग से व सभी तरह के सेवाभावी व्यक्तियों से दवाइयां, वस्त्र, उपकरण व अन्य आवश्यक सामग्री जरूरतमंद व्यक्तियों और समुदायों से सहयोग मिल जाता है.
स्वयंसेवी संस्थाएं अलाभकारी संस्था के रूप में कार्य करती है इसलिए वे इसे बिजनेस-व्यापार-व्यवसाय के रूप में अपना माल बेचकर शुद्ध मुनाफा नहीं ले सकती. इसका तात्पर्य यह है कि संस्था संचालक एक व्यापारी की तरह शुद्ध मुनाफे का स्वयं के निजी उपयोग के लिए नहीं कर सकते. वे मुनाफे का उपयोग जनहित में, जरुरतमंदों पर, आम जनता पर, प्रोजेक्ट में निर्धारित लाभार्थियों पर और संस्था के कार्यक्षेत्र को विस्तार देने में कर सकते हैं जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाभ हो. कंपनी व्यवसाय या निजी कारोबार लाभकारी होता है और स्वयं सेवी संस्थान के जरिये किया जाने वाला कार्य और होने वाली आय अलाभकारी होती है अर्थात उसे निजी हित में या संस्थान के सदस्यों के मुनाफे के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. इसका अपयोग सिर्फ जनहित में, योग्य और अनुदान के लिए पात्र व्यक्तियों, समूहों के लिए और जनसेवा में, पर्यावरण आदि सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय कार्यों के लिए किया जाता है और किया जाना आवश्यक है. यही आम जनहित ही स्वयं सेवी संस्थान बनाने व संचालित करने का कारण, मूल आधार और मूल लक्ष्य और उपयोग है.
स्वयंसेवी संस्था (NGO) के सारे मिशन, विजन, उद्देश्य और लक्ष्य मानवजीवन और सभ्यता के विकास के लिए होते है.

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